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“बेबी है, अब बाबू चाहिए” कहकर सास ने IVF कराने की मांग: डॉक्टर ने बताई असली मेडिकल सच्चाई

## Short Summary एक मामले में सास ने बहू पर “बेबी है, अब बाबू चाहिए” कहकर फिर से IVF कराने का दबाव बनाया। डॉक्टर ने स्पष्ट किया कि IVF (infertility का इलाज) केवल बांझपन के इलाज के लिए होता है, न कि लड़का या लड़की चुनने के लिए। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में लिंग चयन पूरी तरह अवैध है और ऐसे दबाव से महिलाओं पर मानसिक तनाव बढ़ सकता है। यह घटना समाज में बेटे की चाहत और गलत धारणाओं को उजागर करती है।

एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक परिवार में बेटी के जन्म के बाद सास ने बहू पर फिर से IVF (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) कराने का दबाव बनाया। सास ने कथित तौर पर कहा—“बेबी है, अब बाबू चाहिए”, यानी अब लड़का पैदा होना चाहिए। इस घटना ने सामाजिक सोच और मेडिकल समझ दोनों पर बहस छेड़ दी है। मामले में पीड़िता ने जब यह दबाव महसूस किया तो वह डॉक्टर के पास परामर्श के लिए पहुंची। इस पर डॉक्टर ने स्पष्ट किया कि IVF कोई लिंग चयन (gender selection) का साधन नहीं है और भारत में भ्रूण के लिंग की पहचान या चयन करना कानूनन अपराध है। डॉक्टर ने समझाया कि IVF तकनीक केवल उन दंपतियों के लिए है जिन्हें प्राकृतिक रूप से गर्भधारण में समस्या होती है, न कि लड़का या लड़की चुनने के लिए। डॉक्टर ने यह भी बताया कि भ्रूण का लिंग पूरी तरह जैविक रूप से निर्धारित होता है और किसी भी तकनीक का उपयोग करके इसे बदलना या चुनना न तो नैतिक है और न ही कानूनी रूप से स्वीकार्य। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह के दबाव से महिलाओं पर मानसिक और शारीरिक तनाव बढ़ता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि समाज में अभी भी बेटे की चाहत को लेकर पुरानी सोच मौजूद है, जो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और कानून दोनों के खिलाफ है। infertility के इलाज के लिए IVF एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, लेकिन इसका गलत उपयोग गंभीर सामाजिक समस्या को जन्म देता है। यह मामला एक बार फिर इस बात को उजागर करता है कि शिक्षा और जागरूकता के बावजूद कई जगहों पर लैंगिक भेदभाव अभी भी जारी है। डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपील की है कि परिवारों को विज्ञान को समझना चाहिए और बेटे-बेटी में समानता को अपनाना चाहिए।फिलहाल पीड़िता को काउंसलिंग दी जा रही है और विशेषज्ञों की निगरानी में आगे की चिकित्सा प्रक्रिया पर सलाह दी जा रही है। यह घटना समाज के लिए एक बड़ा संदेश है कि तकनीक का उपयोग इलाज के लिए होना चाहिए, न कि किसी भी तरह के लैंगिक भेदभाव के लिए।

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